रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और CM योगी आज करेंगे महंत अवैद्यनाथ की प्रतिमा का अनावरण

Published on : 12:10 AM Sep 24, 2021

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को महाराजगंज जिले के चौक में स्थित गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ की प्रतिमा का अनावरण करेंगे. जिसको लेकर जिला प्रशासन तैयारी पूरी कर ली है. सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कड़े इंतजाम किए गए हैं.

महराजगंज: ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ की पुण्यस्मृति कार्यक्रम में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शुक्रवार को महराजगंज जिले में मौजूद रहेंगे.इनके साथ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी भी मौजूद रहेंगे. यहां गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ महाविद्यालय चौक में महंत अवैद्यनाथ की प्रतिमा का अनावरण करेंगे. जिसको लेकर जिला प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है.इसी सिलसिले में पुलिस अधीक्षक प्रदीप गुप्ता ने गुरुवार को कार्यक्रम स्थल पर पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था में लगे कर्मियों की ब्रीफिंग की. इस कार्यक्रम को लेकर जोर शोर से तैयारियां चल रही हैं. केन्द्रीय मंत्री और स्थानीय सांसद पंकज चौधरी गुरुवार को ही महराजगंज पहुंच गए हैं.

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पांच बार विधायक और चार बार सांसद रहने का अनूठा रिकॉर्ड है महंत अवेद्यनाथ के नाम
राजनीति के क्षेत्र में भी अनूठा रिकार्ड है. उन्होंने पांच बार (1962, 1967, 1969, 1974 व 1977) मानीराम विधानसभा सीट और चार बार (1970, 1989,1991 व 1996) गोरखपुर सदर संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व किया था. वह अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के उपाध्यक्ष व महासचिव के रूप में भी प्रतिष्ठित रहे.

महंत अवैद्यनाथ

गढ़वाल में हुआ था जन्म Advertisement

18 मई 1919 को गढ़वाल (उत्तराखंड) के ग्राम कांडी में जन्मे महंत अवैद्यनाथ का बचपन से ही धर्म, अध्यात्म के प्रति गहरा झुकाव था. उनके इस जुड़ाव को विस्तृत आयाम नाथपंथ के विश्वविख्यात गोरक्षपीठ में महंत दिग्विजयनाथ के सानिध्य में मिला. गोरक्षपीठ में उनकी विधिवत दीक्षा 8 फरवरी 1942 को हुई और वर्ष 1969 में महंत दिग्विजयनाथ की चिर समाधि के बाद 29 सितंबर 1969 को वह गोरखनाथ मंदिर के महंत और पीठाधीश्वर बने.

ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के जीवन में दो ही सपने थे. पहला ऊंच-नीच, जाति-पाति और छुआछूत एवं अस्पृश्यता की कुरीति को खत्म कर सामाजिक समरसता की स्थापना करना. दूसरा सपना था अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण. इन दोनों सपनों को पूरा करने के लिए वह ताउम्र मिशनरी भाव से जुड़े रहे.नाथपंथ की लोक कल्याण की परंपरा को धर्म के साथ राजनीति से भी संबद्ध कर महंत अवैद्यनाथ ने पांच बार मानीराम विधानसभा और चार बार गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी किया. श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए हुए आंदोलन को निर्णायक पड़ाव देने के लिए इस राष्ट्रसंत को निश्चित ही युगों-युगों तक याद किया जाएगा.

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महंत अवैद्यनाथ और योगी आदित्यनाथ.
योग और दर्शन के मर्मज्ञ पीठाधीश्वर के रूप में उन्होंने अपने गुरुदेव के लोक कल्याणकारी व सामाजिक समरसता के आदर्शों का फलक और विस्तारित किया. यह सिलसिला 2014 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को उनके चिर समाधिस्थ होने तक अनवरत जारी रहा.अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों का योगदान स्वर्णाक्षरों में अंकित है. महंत दिग्विजयनाथ ने अपने जीवनकाल में मंदिर आंदोलन में क्रांतिकारी नवसंचार किया तो उनके बाद इसकी कमान संभाली महंत अवेद्यनाथ ने. नब्बे के दशक में उनके ही नेतृत्व में श्रीराम मंदिर आंदोलन को समग्र, व्यापक और निर्णायक मोड़ मिला. आंदोलन की ज्वाला गांव-गांव तक प्रज्वलित हुई.
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम.
महंत अवैद्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष के रूप में आंदोलन में संतो, राजनीतिज्ञों और आमजन को एकसूत्र में पिरोया. यह भी सुखद संयोग है कि पांच सदी के इंतजार के बाद अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण का मार्ग उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ की देखरेख में प्रशस्त हुआ है.
डोमराजा के घर संतों के साथ भोजन कर कायम की सामाजिक समरसता की मिसाल
महंत अवैद्यनाथ वास्तविक अर्थों में धर्माचार्य थे. धर्म के मूल मर्म सामाजिक समरसता को उन्होंने अपने जीवनपथ का उद्देश्य बनाया. आजीवन उन्होंने हिन्दू समाज से छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने के लिए वृहद अभियान चलाया. अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बरहपंथ योगी महासभा के अध्यक्ष के रूप में महंत अवैद्यनाथ ने देशभर के संतों को भी अपने इसी अभियान से जोड़ा. अपने स्पष्ट विचारों के चलते पूरे देश के संत समाज में अति सम्माननीय रहे महंत अवैद्यनाथ दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में दलित समाज के सामूहिक धर्मांतरण की घटना से बहुत दुखी हुए. इस तरह की पुनरावृत्ति उत्तर भारत में न हो, इसी कारण से धर्म के साथ उन्होंने राजनीति की भी राह चुनी. उनका ध्येय हिन्दू समाज की कुरीतियों को दूर कर पूरे समाज को एकजुट करना था. इसे लेकर उन्होंने दलित बस्तियों में सहभोज अभियान शुरू किया जहां जातिगत विभेद से परे सभी लोग एक पंगत में भोजन करते. काशी में डोमराजा के घर संत समाज के साथ भोजन कर महंत अवैद्यनाथ ने सामाजिक समरसता का देशव्यापी संदेश दिया. सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों राम मंदिर के भूमिपूजन की पहली ईंट रखवाई.
सुरक्षा व्यवस्था में लगे कर्मियों की ब्रीफिंग
भगवान राम और देवी दुर्गा के जरिए देते थे समाज को एकजुट होने का संदेश
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महंत अवैद्यनाथ सामाजिक समरसता को मजबूत करने के लिए प्रभु श्रीराम और देवी दुर्गा के उद्धरणों से संदेश देते थे, ऐसे संदेश उनकी दिनचर्या में शामिल थे. महंतश्री लोगों को व्यावहारिक रूप में समझाते थे कि प्रभु श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर खाए, निषादराज को गले लगाया, गिद्धराज जटायु का अंतिम संस्कार अपने हाथों किया, वनवास के दौरान वनवासियों से मित्रता की तो इसके पीछे उनकी सोच समरस समाज की स्थापना ही थी.
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