महराजगंज की पनियरा विधानसभा सीट, CM बन वीर बहादुर सिंह ने बदल दी थी पूर्वी उत्तर प्रदेश की तकदीर

Published on : 10:25 AM Sep 24, 2021

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह की कर्मभूमि महराजगंज जिले का पनियरा विधानसभा सीट एक ऐसी सीट है जहां पर मुद्दे तो बहुत हैं, लेकिन चुनाव में यह कभी हावी होते नजर नहीं आते हैं. इस विधानसभा की सबसे बड़ी समस्या गांव को जोड़ने वाली गड्ढों में तब्दील सड़कें तो है ही साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और जल निकासी का समस्या बनी हुई हैं.

महराजगंज: विधानसभा चुनाव को लेकर जहां जिले में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है वहीं चुनाव मैदान में उतरे विभिन्न पार्टियों के नेताओं द्वारा मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की दावे और वादे किए जा रहे हैं. जिले का पनियरा विधानसभा अपने आप में एक महत्वपूर्ण विधानसभा है. इसी विधानसभा ने सूबे को सफल मुख्यमंत्री भी दिया था और पूर्वी उत्तर प्रदेश की तकदीर इसी विधान सभा ने बदलने का काम किया.

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सीट का सियासी इतिहास

देश को आजादी मिलने के बाद 1952 में आम चुनाव हुआ था. इस सीट से कांग्रेस पार्टी से द्वारिका प्रसाद पांडेय पहली बार विधायक बने. इसके बाद श्री पांडेय 1957 में पुनः चुनाव जीते.
1962 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने वीर बहादुर सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया और वह चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे. इसके बाद वीर बहादुर सिंह कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी के रूप में 1967, 1969 और 1974 के चुनाव में लगातार अपनी जीत दर्ज कर विधानसभा में पहुंचे. 1977 में वीर बहादुर सिंह कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पुनः चुनाव लड़े लेकिन उन्हें निर्दल प्रत्याशी गुंजेश्वर ने हरा दिया. Advertisement

पनियरा विधानसभा की डेमोग्राफिक रिपोर्ट

इसके बाद 1980 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी से वीर बहादुर सिंह ने जनता पार्टी के कुंजेश्वर तिवारी को शिकस्त देकर विधानसभा में पहुंचे. जिसके बाद उनकी तकदीर बदल गई और वह सिंचाई मंत्री बनाए गए. इसके बाद 1985 के चुनाव में वीर बहादुर सिंह फिर जीते और वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. वीर बहादुर सिंह ने 24 सितंबर 1985 को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री की शपथ ली और 24 जून 1988 तक मुख्यमंत्री बने रहे. इसके बाद उन्हें केंद्र में संचार मंत्री बनाया गया लेकिन कुछ ही महीने बाद उनका आकाश्मिक निधन हो गया.


विधानसभा पनियरा क्षेत्र में विकास के नाम पर जो कुछ भी है उसका श्रेय वीर बहादुर सिंह को जाता है. विकास की राह पर चल रही गाड़ी उनके निधन से एका एक रूक गई. इसके बाद 1989 के चुनाव में वीर बहादुर सिंह के निधन से जितनी सहानुभूति उनके पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी फतेह बहादुर सिंह को मिलने की उम्मीद थी उतना नहीं मिली.
पनियरा विधानसभा की जनता ने उन्हें नकार दिया और पनियरा विधानसभा से निर्दल प्रत्याशी गणपत सिंह को अपना विधायक चुना, जबकि कांग्रेस अपने उम्मीदवार फतेह बहादुर के लिए सहानुभूति की लहर चला रही थी. जिसका असर जनता पर नहीं पड़ा.

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इसके बाद 1991 के चुनाव में यहां जनता दल के प्रत्याशी परशुराम मिश्रा को हराकर कांग्रेश प्रत्याशी फतेह बहादुर सिंह विधानसभा में पहुंचे. मगर 1993 में गणपत सिंह फिर भाजपा का टिकट लेकर चुनाव मैदान में कूद पड़े, तो इस बार जनता ने उन्हें विधायक चुन लिया. इस चुनाव में दूसरे स्थान पर परशुराम मिश्रा रहे. इसके बाद 1996 में जब बसपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस के प्रत्याशी फतेह बहादुर सिंह एक बार फिर चुनाव जीते. इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी अन्नपूर्णा मिश्रा दूसरे स्थान पर थी और निर्दल प्रत्याशी बद्री प्रसाद जायसवाल तीसरे स्थान पर रहे.
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में फतेह बहादुर सिंह ने भाजपा को छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया और बसपा के टिकट से चुनाव लड़े और विजय प्राप्त कर वन मंत्री बने.
वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा से देवनारायण उर्फ जीएम सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी ज्ञानेंद्र सिंह को हरा कर पनियरा विधानसभा के विधायक बने. तीसरे स्थान पर सपा से जनार्दन प्रसाद ओझा और कांग्रेस पार्टी से तलत अजीज चौथे स्थान पर रही. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव मोदी लहर में भारतीय जनता पार्टी से ज्ञानेंद्र सिंह बसपा प्रत्याशी गणेश शंकर पांडेय को हराकर पनियरा विधानसभा के विधायक बने. इस बार भी कांग्रेसी प्रत्याशी तलत अजीज तीसरे पर और निषाद पार्टी से सुमन ओझा चौथे स्थान पर रही.


मतदाताओं का आंकड़ा

जनवरी माह में पूरी हुई मतदाता सूची का पुनरीक्षण के बाद पनियरा विधानसभा क्षेत्र में कुल चार लाख चार हजार छियासी मतदाता हैं. जिसमें से 218039 पुरुष और 186024 महिला मतदाता शामिल है.

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