जाट बहुल क्षेत्र होने के बाद भी रालोद से छिटकती रही सादाबाद सीट

Published on : 09:12 AM Dec 04, 2021

यूपी के हाथरस जिले की सादाबाद विधानसभा जाट बहुल सीट है. जाट लोकदल के वोटर माने जाते हैं. बावजूद इसके पिछले दो चुनावों से यहां राष्ट्रीय लोकदल को विफलता का मुंह देखना पड़ रहा है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और कहां पार्टी चूक जा रही है के बारे में जानने को ईटीवी भारत की टीम ने राष्ट्रीय लोकदल के कुछ नेताओं से बात की.

हाथरस: यूपी के हाथरस जिले की सादाबाद विधानसभा (Sadabad assembly seat) जाट बहुल सीट है. जाट लोकदल के वोटर माने जाते हैं. बावजूद इसके पिछले दो चुनावों से यहां राष्ट्रीय लोकदल को विफलता का मुंह देखना पड़ रहा है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और कहां पार्टी चूक जा रही है के बारे में जानने को ईटीवी भारत की टीम ने राष्ट्रीय लोकदल के कुछ नेताओं से बात की. वहीं, बातचीत के दौरान पार्टी के स्थानीय नेताओं ने कहा कि अबकी उन्हें यहां सफलता मिलने जा रही है और वे रालोद की जीत को लेकर इसलिए भी आश्वस्त हैं, क्योंकि पार्टी के कार्यकर्ता लगातार क्षेत्र में सक्रिय हो जनसंपर्क को विशेष महत्व दे रहे हैं.

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वहीं, रालोद नेता व पूर्व विधायक प्रताप चौधरी ने कहा कि इस सीट पर किसी न किसी रूप में लोकदल जीतती रही है. पिछले चुनाव में जब प्रदेश में भाजपा की लहर थी तब भी हमारी पार्टी को 65 हजार वोट मिले थे. सादाबाद की जनता ने सर्वाधिक वोट देकर लोकदल के प्रत्याशी को जिताने की कोशिश की थी. हार-जीत तो होती रहती है. उन्होंने कहा कि यह तो हमेशा चौधरी चरण सिंह का गढ़ रहा है.

रालोद से छिटकती रही सादाबाद सीट

यहां जाट ही नहीं, बल्कि तमाम जातियां जो खेती-बाड़ी करती है, वे सारे लोग लोकदल से ही जुड़े हैं. पार्टी के जिलाध्यक्ष केशव देव ने बताया कि हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराएंगे. हमारी पार्टी किसानों की पार्टी है. सादाबाद क्षेत्र आलू का उत्पादक क्षेत्र है. इसके लिए यहां आलू की खपत के लिए प्लांट लगाए जाएंगे. Advertisement

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रालोद से छिटकती रही सादाबाद सीट

पार्टी के युवा नेता चौधरी महीपाल सिंह अपनी पार्टी का समाजवादी पार्टी से गठबंधन को बेहतर बताते हैं. उनका मानना है कि प्रदेश में इस बार सपा-रालोद गठबंधन की सरकार बनेगी. वहीं, अन्य पार्टियों से गठबंधन को उन्होंने समय की मांग करार दिया. साथ ही उन्होंने कहा कि इससे पार्टी का वोट बढ़ेगा.

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  • वर्ष-1991- चौधरी बृजेन्द्र सिंह-भाजपा
  • वर्ष-1993 - चौधरी विशम्भर सिंह-जनता दल
  • वर्ष-1996 - चौधरी विशम्भर सिंह-भाजपा
  • वर्ष-2001 - चौधरी विशम्भर सिंह की मौत के बाद हुए उप चुनाव में रामसरन आर्य - रालोद
  • वर्ष-2002 - प्रताप चौधरी-रालोद
  • वर्ष-2007 - डॉ. अनिल चौधरी-रालोद
  • वर्ष-2012 - देवेंद्र अग्रवाल-सपा
  • वर्ष-2017 - रामवीर उपाध्याय-बसपा

खैर, देखने वाली बात यह होगी कि क्या इस बार यहां की जनता राष्ट्रीय लोकदल को समर्थन देती है या नहीं.

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