मस्जिद ध्वस्तीकरण मामला: सपा प्रतिनिधिमंडल ने डीएम को सौंपा ज्ञापन

Published on : 12:35 AM May 21, 2021

बाराबंकी में जिला प्रशासन द्वारा कराई गई मस्जिद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से आमजन में खासी नाराजगी है. तमाम राजनीतिक दलों ने इसे प्रशासन की मनमानी करार दिया है. समाजवादी पार्टी ने इस मामले में इंसाफ के लिए अंतिम दम तक लड़ाई लड़ने की बात कही है.

बाराबंकीः समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर गुरुवार को समाजवादी पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा है. मांग की गई है कि मामले की हाईकोर्ट के सिटिंग जज से जांच कराई जाए.

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जानकारी देते सपा प्रतिनिधिमंडल के सदस्य.

ध्वस्त कर दी गई मस्जिद को प्रशासन बता रहा अवैध भवन

बताते चलें कि यहां की तहसील रामसनेहीघाट के कस्बा सुमेरगंज में स्थित 100 वर्षों की पुरानी एक मस्जिद के ध्वस्तीकरण का मामला गर्म हो गया है. राजनीतिक गलियों में इसको लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं. जिला प्रशासन द्वारा की गई इस कार्रवाई से जन मानस में खासा आक्रोश है. समाजवादी पार्टी ने जिला प्रशासन द्वारा की गई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को गलत और मनमाना करार दिया है. Advertisement

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मस्जिद.

सपा के प्रतिनिधिमंडल ने डीएम को सौंपा ज्ञापन

इस मामले की गूंज राजधानी तक पहुंच चुकी है. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर गुरुवार को सपा का एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी से मिलकर एक मेमोरेंडम सौंपा. जिला अध्यक्ष हाफिज अयाज की अगुवाई में प्रतिनिधिमंडल में पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद सिंह गोप, पूर्व सांसद रामसागर रावत, एमएलसी राजेश यादव राजू, बाराबंकी विधायक सुरेश यादव ने जिलाधिकारी को मेमोरेंडम सौंपा.

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इंसाफ के लिए अंतिम दम तक लड़ेगी सपा

अरविंद सिंह गोप ने कहा कि 100 साल पुरानी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया. सपा इसकी निष्पक्ष जांच की मांग करती है. इस मामले में जो भी दोषी हो उसको कड़ी से कड़ी सजा दी जाए. पार्टी नेताओं ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा किसी प्रकार के ध्वस्तीकरण पर 31 मई तक रोक लगाने के बावजूद ऐसी कौन सी वजह आ गई कि रातों-रात मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया. नेताओं ने कहा कि समाजवादी पार्टी अंतिम दम तक ये लड़ाई लड़ेगी.

क्या है मामला

बताते चलें कि रामसनेहीघाट तहसील परिसर में बने भवनों का बीते 15 मार्च को ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दिव्यांशु पटेल ने वेरिफिकेशन कराया था. एसडीएम आवास के सामने बनी मस्जिद में रह रहे लोगों को 15 मार्च को नोटिस भेजकर सुनवाई का अवसर दिया गया था, लेकिन वहां रह रहे लोग फरार हो गए थे. उसके बाद ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने तहसील की बाउंड्री पर लगा गेट हटाकर बाउंड्री करा दी थी. साथ ही बाहरी लोगों के आवागमन को प्रतिबंधित कर दिया था. तहसील प्रशासन द्वारा की गई इस कार्रवाई के बाद मुस्लिम वर्ग के लोगों ने प्रशासन की इस कार्रवाई को गलत बताया था.

स्थानीय लोगों का कहना है कि मार्च महीने में भीड़ की वजह से कुछ अफसरों की गाड़ी गेट के पास जाम में फंस गई थी. उसके बाद यह कार्रवाई शुरू हुई. प्रशासन द्वारा दी गई नोटिस के विरोध में 19 मार्च शाम को प्रशासन के खिलाफ स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया था. विरोध के दौरान कुछ लोगों ने पथराव किया था, जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था. इस मामले में कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके जेल भेजा गया था.

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भारी पुलिस बल की मौजूदगी में हुई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई

सोमवार शाम को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में जिला प्रशासन ने जेसीबी लगाकर मस्जिद को ध्वस्त करा दिया और रातों रात मलबा भी उठवा दिया. इस कार्रवाई के बाद भूचाल आ गया. स्थानीय लोगों ने इसे प्रशासन की मनमानी और ज्यादती करार दिया. स्थानीय लोगों का कहना है कि मस्जिद वक्फ बोर्ड में दर्ज है. इस मामले की एक रिट भी न्यायालय में दाखिल की गई थी, लेकिन प्रशासन ने बिना सुनवाई के मस्जिद ध्वस्त करा दी.

सुन्नी वक्फ बोर्ड में दर्ज है मस्जिद

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर अहमद फारूकी का कहना है कि मस्जिद को गिराना सीधे तौर पर हाईकोर्ट की अवहेलना है. उन्होंने कहा कि मस्जिद की लोकल कमेटी हाईकोर्ट गई थी, लेकिन बिना कोई नोटिस दिए एसडीएम ने ऑर्डर पास कर अपने ऑर्डर की तामील कराकर मस्जिद को ध्वस्त करा दिया. यही नहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड और लोकल लोगों ने हाईकोर्ट के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें 24 अप्रैल को हाईकोर्ट ने एक रिट पर सुनवाई करते हुए सरकारी सम्पत्तियों पर बने किसी भी धार्मिक निर्माण पर कोविड महामारी को देखते हुए 31 मई तक, किसी तरह की कार्रवाई न करने का आदेश दिया था. बावजूद इसके जिला प्रशासन ने कोर्ट की अवहेलना करके रातों रात मस्जिद को गिरा दिया.

प्रशासन नहीं मानता मस्जिद

हालांकि जिला प्रशासन इसे मस्जिद नहीं मानता है, बल्कि इसे आवासीय निर्माण बता रहा है. प्रशासन का कहना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा रिट याचिका संख्या 7948 एमवी ऑफ 2021 में पारित आदेश के क्रम में पक्षकारों का प्रत्यावेदन दिनांक 2 अप्रैल को निस्तारित करने पर यह तथ्य सिद्ध हुआ कि ये आवासीय निर्माण अवैध था. इस आधार पर उप जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय रामसनेहीघाट पर न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत वाद योजित किया गया. इस प्रकरण में न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत पारित आदेश का मौके पर अनुपालन कराया गया.

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